'अरे ज़रूर....., आप बस इस तरह याद करते रहे तो हम इससे भी बड़े कारनामे कर दिखाएँगे' बड़े हंसते हुए फोन रखते रखते मैने कहा, 'चलो, आकर बात करता हूँ अभी कही ज़रूरी काम से बाहर जा रहा हूँ' और सीढ़ियाँ उतरते हुए फोन काट दिया | कभी कभी मुझे खुद की ही इस बात से बड़ी कोफ़्त सी होने लगती है, मसलन बस काम भर की बात, ना एक सूद इधर ना आधा सूद उधर| आज भी मुझे सामाजिक व्यवहार करना नही आता, लोगो से मिलता हूँ, कुछ देर तक बात भी कर लेता हूँ, पर..... वो बात नही आई जो व्यक्ति को एक सामाजिक दर्जा देती है, जैसे मेरे माता-पिता, और वो सब लोग जिन्हे मैं बचपन से अपने घर मे, आस पड़ोस मे देखता आया हूँ; वो किसी से भी घंटो बात कर लेते है और इस काम मे इतने निपुण हो चुके है कि उन्हे देख कर ये लगता ही नही के उन्हे कुछ प्रयास भी करना पड़ा हो| आज भी अमूमन हाल चाल जान लेने के बाद मेरे पास अन्य कोई विषय नही होता अपने रिश्तेदारो से बात करने के लिए, कुछ उनमे से मुझे अक्सर ग़लत भी समझ लेते हैं, पर मज़े की बात ये है कि अब मुझे फ़र्क़ भी नही पड़ता | अपनी इस बात को बिना किसी तकल्लूफ के रख देता हूँ क़ि जनाब ये हमसे नही हो पाएगा, इसलिए इस तरह की कोई आशा भी ना रखे| इसके पीछे भरोसा है, माता-पिता तो है ही, कुछ ग़लत हो गया तो संभाल लेंगे |
अचानक एक और फोन की घंटी से मैं ठिठक कर रुक गया, बड़े भारी मन से मुझे फोन उठाना पड़ रहा था, शायद मैं जानता था कि ये एक बुरी खबर ही हो सकती है| अल्पायु मे एक करीबी के दीवंगत होने की खबर थी, और मैं इस तरह की खबरो का आदी ना कभी था और शायद ना कभी हो पाउँ | इसी मानसिक उथल पुथल मे सीढ़ियो पर गिरा पानी देख नही पाया और फिसल कर गिर पड़ा | गिरने से लगी चोट यूँ तो काफ़ी दर्द देती है पर वो और भी दर्दनाक हो जाती है जब भरी सरदियों मे लगी हो| पल भर मे मेरा घुटना सूज कर कुप्पा हो गया| गिरने से हूई आवाज़ के कारण घर के लोग देखने के लिए बाहर आ गये, शुक्र है मेरा बेटा घर पर नही था, वो क्या सोचता, पापा मुझे पूरा समय जिस चीज़ के लिए डाँटते रहते है और वो खुद ही गिर गये| चलो जो होता है अच्छे के लिए ही होता है, ये सोचने भर से जैसे मेरा सारा दर्द काफूर हो गया, और जैसे ही मैं खुद को संभाल कर आगे बढ़ा, तुरंत उस दुख़ भरी खबर ने फिर मेरा दिल पकड़ लिया, आगे बढ़ते हुए मैं सोच ही रहा था की उसके घर फोन करूँ, और अगले ही पल मेरे घुटने फिर जवाब दे गये| तो बाहर जाने का कार्यक्रम कुछ देर के लिए ट्ल गया, और मैं घर के अहाते मे खड़ी बाइक पर धम्म से बैठ गया |
कुछ देर के आराम के बाद लगा क़ि अब चला जा सकता है तो वही बाइक लेकर चल पड़ा, क्या करें काम कुछ ज़रूरी था | पूरे रास्ते भर अपने उस करीबी और उसके परिवार के बारे मे ही सोचता रहा, माता पिता से भी इस बारे मे चर्चा की, उन्होने भी मुझे एक सांत्वना फोन करने की सलाह दी, चाहता तो मैं भी था पर मैं खुद को अभी भी ठीक से समझा नही पाया था, तो दर्द का बहाना बना कर टाल दिया | क्या कहता क़ि मुझे अफ़सोस है, या ईश्वर आपको शक्ति दे, ऐसी कोई बात मेरे दिमाग़ मे नही आ रही थी जो उनकी वास्तव मे मदद कर सकती थी या जो उनको पहले से पता ना हो | बड़े क्षुब्ध मन से मैं घर की तरफ़ बढ़ रहा था| ऐसे समय पर माता पिता ही याद आते है, सो मैंने पुनः फोन किया, "फोन करना ही क्यूँ होता है, ऐसा क्या कहना होता है जो अगर नही कहा तो जिया ना जा सकेगा? और मेरे कुछ भी कहने से उनके जख्म फिर से तो ना खुल जाएँगे? तो ऐसी बात ही क्यूँ करनी जिससे उनको तकलीफ़ हो?" मैं अभी तक इस सांत्वना के लेन-देन से दूर ही था, "ऐसा करने से उनके दर्द तो कम नहीं होते पर ऐसा एक फोन या खत, अपनो के साथ होने का ये सम्मिलित प्रयास, उन्हे आगे बढ़ने की शक्ति देता है, जो उन्हे पुनर्स्थापित करने मे एक सम्बल की तरह मदद करता है, जब तेरे दादाजी का स्वर्गवास हुआ था तो हम सब एक दूसरे की मदद से आगे बढ़े थे......." माँ से सुनते सुनते लगा वो शायद अब भावनात्मक हो रही है तो मैने बात बदल दी, "हाँ ..... समझ गया, मैं फोन कर लूँगा, चलो अभी जाना है, बाद मे बात करूँगा" |
घर लौट कर अपने सूजे हुए घुटने पर बाम मलते हुए सोच रहा हूँ, ये चोट भी बड़ी अजीब होती है, किस चोट पर ध्यान दूं समझ नही आ रहा, मेरी माँ की भावनात्मक बातों से जो मेरे दिल को लगी, या उस करीबी व्यक्ति के गम से जो मानसिकता पर पड़ी, या जो समाज मे आज-कल चल रहा है, या अपने घुटने की तरफ | अजीब सिलसिला है.....
अचानक एक और फोन की घंटी से मैं ठिठक कर रुक गया, बड़े भारी मन से मुझे फोन उठाना पड़ रहा था, शायद मैं जानता था कि ये एक बुरी खबर ही हो सकती है| अल्पायु मे एक करीबी के दीवंगत होने की खबर थी, और मैं इस तरह की खबरो का आदी ना कभी था और शायद ना कभी हो पाउँ | इसी मानसिक उथल पुथल मे सीढ़ियो पर गिरा पानी देख नही पाया और फिसल कर गिर पड़ा | गिरने से लगी चोट यूँ तो काफ़ी दर्द देती है पर वो और भी दर्दनाक हो जाती है जब भरी सरदियों मे लगी हो| पल भर मे मेरा घुटना सूज कर कुप्पा हो गया| गिरने से हूई आवाज़ के कारण घर के लोग देखने के लिए बाहर आ गये, शुक्र है मेरा बेटा घर पर नही था, वो क्या सोचता, पापा मुझे पूरा समय जिस चीज़ के लिए डाँटते रहते है और वो खुद ही गिर गये| चलो जो होता है अच्छे के लिए ही होता है, ये सोचने भर से जैसे मेरा सारा दर्द काफूर हो गया, और जैसे ही मैं खुद को संभाल कर आगे बढ़ा, तुरंत उस दुख़ भरी खबर ने फिर मेरा दिल पकड़ लिया, आगे बढ़ते हुए मैं सोच ही रहा था की उसके घर फोन करूँ, और अगले ही पल मेरे घुटने फिर जवाब दे गये| तो बाहर जाने का कार्यक्रम कुछ देर के लिए ट्ल गया, और मैं घर के अहाते मे खड़ी बाइक पर धम्म से बैठ गया |
कुछ देर के आराम के बाद लगा क़ि अब चला जा सकता है तो वही बाइक लेकर चल पड़ा, क्या करें काम कुछ ज़रूरी था | पूरे रास्ते भर अपने उस करीबी और उसके परिवार के बारे मे ही सोचता रहा, माता पिता से भी इस बारे मे चर्चा की, उन्होने भी मुझे एक सांत्वना फोन करने की सलाह दी, चाहता तो मैं भी था पर मैं खुद को अभी भी ठीक से समझा नही पाया था, तो दर्द का बहाना बना कर टाल दिया | क्या कहता क़ि मुझे अफ़सोस है, या ईश्वर आपको शक्ति दे, ऐसी कोई बात मेरे दिमाग़ मे नही आ रही थी जो उनकी वास्तव मे मदद कर सकती थी या जो उनको पहले से पता ना हो | बड़े क्षुब्ध मन से मैं घर की तरफ़ बढ़ रहा था| ऐसे समय पर माता पिता ही याद आते है, सो मैंने पुनः फोन किया, "फोन करना ही क्यूँ होता है, ऐसा क्या कहना होता है जो अगर नही कहा तो जिया ना जा सकेगा? और मेरे कुछ भी कहने से उनके जख्म फिर से तो ना खुल जाएँगे? तो ऐसी बात ही क्यूँ करनी जिससे उनको तकलीफ़ हो?" मैं अभी तक इस सांत्वना के लेन-देन से दूर ही था, "ऐसा करने से उनके दर्द तो कम नहीं होते पर ऐसा एक फोन या खत, अपनो के साथ होने का ये सम्मिलित प्रयास, उन्हे आगे बढ़ने की शक्ति देता है, जो उन्हे पुनर्स्थापित करने मे एक सम्बल की तरह मदद करता है, जब तेरे दादाजी का स्वर्गवास हुआ था तो हम सब एक दूसरे की मदद से आगे बढ़े थे......." माँ से सुनते सुनते लगा वो शायद अब भावनात्मक हो रही है तो मैने बात बदल दी, "हाँ ..... समझ गया, मैं फोन कर लूँगा, चलो अभी जाना है, बाद मे बात करूँगा" |
घर लौट कर अपने सूजे हुए घुटने पर बाम मलते हुए सोच रहा हूँ, ये चोट भी बड़ी अजीब होती है, किस चोट पर ध्यान दूं समझ नही आ रहा, मेरी माँ की भावनात्मक बातों से जो मेरे दिल को लगी, या उस करीबी व्यक्ति के गम से जो मानसिकता पर पड़ी, या जो समाज मे आज-कल चल रहा है, या अपने घुटने की तरफ | अजीब सिलसिला है.....
